Tuesday, November 28, 2017

गीता जयंती - इस दिन भगवान श्रीकृष्‍ण ने अर्जुन को दिया था गीता का संदेश

भगवत गीता हिन्दू धर्म का बहुत ही प्रमुख ग्रंथ है। महाभारत युद्ध में जब पांडव और कौरव आमने-सामने हुए थे तो अपने सगे संबंधियों के खिलाफ शस्‍त्र उठाने को लेकर अर्जुन असमंजस में पड़ गए। अर्जुन को इस मोह और दुविधा से निकालने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को नीति ज्ञान दिया। इस नीति ज्ञान का संकलन भगवत गीता के नाम से जाना जाता है। श्री कृष्ण के मुख कही गई बातों का संकलन होने के कारण इसे भगवान की वाणी भी माना जाता है। जिस दिन भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का संदेश दिया था वह मार्गशीर्ष एकादशी का दिन था। इसलिए इस दिन मोक्षदा एकादशी भी कहा जाता है। अठारह अध्यायों में संकलित भगवद गीता दर्शनशास्त्र का अद्भुत संकलन है, जो मनुष्य को कर्म करते हुए मोक्ष प्राप्ति की राह दिखाता है। माना जाता है कि मोक्षदा एकादशी के दिन जो व्यक्ति गीता का पाठ करता है उसे पूर्व में किए कई पापों से मुक्ति मिल जाती है। इसलिए इस दिन को गीता जयंती के नाम से भी जाना जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि गीता जयंती यानी मोक्षदा एकादशी के दिन भगवत गीता की पूजा करके  आरती करनी चाहिए, इसके पश्चात गीता का पाठ करना चाहिए। इससे महापुण्य की प्राप्त होती है।
 
 

शास्त्रों में बताया गया है कि जो व्यक्ति इस एकादशी का व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करता है और भगवत गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करता है उसके कई जन्मों के पाप कट जाते हैं। ग्यारहवें अध्याय में भगवान श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को विश्वरूप के दर्शन का वर्णन किया गया है। इस अध्याय में बताया गया है कि अर्जुन ने भगवान श्री कृष्ण को संपूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त देखा। श्री कृष्ण में ही अर्जुन ने भगवान शिव, ब्रह्मा एवं जीवन मृत्यु के चक्र को भी देखा। इस अध्याय में भगवान श्री कृष्ण अपने परब्रह्म रूप को व्यक्त करते हैं, जिसे देखकर अर्जुन का मोह भंग हो गया और वह युद्घ करने के लिए तैयार हो गए। इसलिए इस अध्याय का नियमित पाठ बड़ा ही उत्तम फलदायी माना गया है। शास्त्रों के अनुसार जो व्यक्ति नियमित गीता के ग्यारहवें अध्याय का पाठ करता है, उसे भगवान विष्णु के दर्शन का पुण्य प्राप्त होता है।

ऐसे व्यक्ति की आत्मा मृत्यु के पश्चात परमात्मा के स्वरूप में विलीन हो जाती है अर्थात उन्हें मोक्ष मिल जाता है। गीता का अठारवां अध्याय मोक्ष संयास योग के नाम से जाना जाता है। जो व्यक्ति समय के अभाव में संपूर्ण गीता का पाठ नहीं कर पाता हैं वह केवल अठारवें अध्याय का पाठ करें तो उन्हें संपूर्ण गीता पाठ का लाभ मिल जाता है। 

मोक्षदा एकादशी को श्री कृष्ण का पूजन कर व्रत रखने का विधान है इस व्रत को करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। ग्रह शांति के लिए इस व्रत को करने से उत्तम फलों की प्राप्ति होती है। घर पर मंडरा रहे संकटों के बादल समाप्त होते हैं और स्थिर लक्ष्मी का वास होता है।

इस दिन श्रीकृष्ण व गीता का पूजन शुभ फलदायक होता है। ब्राह्मण भोजन कराकर दान आदि कार्य करने से विशेष फल प्राप्त होते हैं। यह एकादशी मोक्षदा के नाम से प्रसिद्ध है। इस दिन भगवान श्रीदामोदर की पूजा, धूप, दीप नैवेद्ध आदि से भक्ति पूर्वक करनी चाहिए। व्रत के दिन स्नान करने के बाद ही मंदिर में पूजा करने के लिये जाना चाहिए। मंदिर या घर में श्रीविष्णु पाठ करना चाहिए और भगवान के सामने व्रत का संकल्प लेना चाहिए। इस व्रत का समापन द्वादशी तिथि के दिन ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देने के बाद ही होता है। व्रत की रात्रि में जागरण करने से व्रत से मिलने वाले शुभ फलों में वृद्धि होती है। मोक्षदा एकादशी व्रत को करने से व्यक्ति के पूर्वज जो नरक में चले गए हैं, उन्हें स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

इस एकादशी के दिन पान न खाएं, किसी की निन्दा न करें, क्रोध न करें, झूठ न बोलें, दिन के समय न सोएं, तेल में बना हुआ खाना न खाएं, कांसे के बर्तनों का इस्तेमाल न करें, व्रत न रख सकें तो प्याज, लहसुन और चावल का सेवन न करें।

Wednesday, November 22, 2017

Vivah Panchami

Vivah Panchami commemorates the weddings of Lord Rama and Goddess Sita which is celebrated on the fifth day of the Shukla Paksha during the month of ‘Margashirsha.’ Vivah Panchami is considered very auspicious as it marks the ceremonial marriage anniversary of Lord Rama and Sita. Just like any Hindu wedding, the celebrations begin several days in advance. The celebrations of Vivah Panchami are very notable in Lord Rama temples, particularly in Mithilanchal region and North India. The day holds immense significance at Janakpur, in Nepal as it is believed that the ceremony was held there.
Lord Ram Along with his brothers, Hanuman and Sita Ma.
Significance of Vivah Panchami:
In Ramayana, the day of Vivah Panchami is considered to be very significant and sacred. Lord Ram, the eldest son of King Dashrath of Ayodhya, is an incarnation of Lord Vishnu. On the Panchami of ‘Margashira,’ Lord Ram visited Janakpur, the birth place of Goddess Sita. He broke the bow of Lord Shiva in the Swayamvara and was married to Sita. To immortalize the wedding ceremony, devotees have been celebrating the wedding of Lord Rama and Devi Sita on Vivah Panchami.
Sriram at the Swayamvar
Legend:
King Janak of Mithila organized a “Swayamvar” ceremony where he invited kings of various kingdoms. Sita, the daughter of Janak, was supposed to choose a groom for herself among them. The condition for marrying Sita was to lift the Dhanush of Lord Shiva and string it. Lord Ram lifted the gigantic bow of Lord Shiva and strung it. King Janak was highly pleased and overwhelmed. Hence, he married his daughter Janaki (Sita) to Ram. During the grand marriage ceremony, the brothers of Ram namely Bharat, Lakshman and Shatrughan were also married to Mandavi, Urmila, and Shuddhakirti respectively.
A view of the marriage
Rituals/ Celebrations:
Vivah Panchami is celebrated with great enthusiasm and fervour in Ayodhya, the birth place of Lord Ram. On this auspicious day, the temples are brightly lit with lamps. The celebrations involve the enactment of the wedding ceremony. A grand procession leaves from one temple to another and ends with the wedding ceremony in the evening. The idols of Lord Ram and Goddess Sati are adorned with clothes and jewellery to make them look like bridegroom and bride. The entire event is known as ‘Ram Vivah Utsav.’ All through the day, devotional songs in praise of Lord Ram are sung by devotees. Several stage shows and cultural programs are also organized on this occasion. Ramleela, a stage performance that depicts the life of Lord Ram and Devi Sita is also observed.
At Janakpur, the celebrations are observed with great fanfare. Special rituals and pujas are held in temples. The celebrations continue for seven days, and devotees observe all the rituals with immense zeal and dedication. Thousands of devotees visit the temples to seek the divine blessings of a happy family life. On the day of Vivah Panchami, as a part of the rituals, devotees take a holy bath in lakes of Mithilanchal (‘Dhanushsagar,’ ‘Gangasagar’ and ‘Argaza Pond’).

Thursday, November 16, 2017

सूर्य का वृश्चिक राशि में प्रवेश

16 नवंबर को दोपहर 12 बजकर 22 मिनट पर सूर्य वृश्चिक राशि में प्रवेश करेंगे। सूर्यदेव जिस राशि में जाते हैं, उस राशि के लिये शुभ परिणाम देने वाले होते हैं। साथ ही अन्य राशियों पर भी इसके अलग-अलग प्रभाव देखने को मिलते हैं, तो किस राशि पर सूर्य के वृश्चिक राशि में इस गोचर से क्या प्रभाव होगा और उसके लिये क्या उपाय करने चाहिए। 

मेष राशि का राशिफल
इस राशि वालों सूर्य आपके आठवें खाने, यानी अष्टम स्थान में प्रवेश करेगा। इस स्थान पर सूर्य आपके लिये हानि कराने वाला हो सकता है। अष्टम स्थान आयु और मृत्यु से संबंध रखता है। अतः सूर्य के अशुभ फलों से बचने के लिये काली गाय या बड़े भाई की सेवा करें। अगर आपका बड़ा भाई नहीं है तो पड़ोस में अपने बड़े भाई जैसे को कुछ गिफ्ट दें। साथ ही अगर किसी important काम के लिये बाहर जा रहे हैं तो मीठा खाकर और पानी पीकर ही जायें, काम बनने में आसानी होगी।   
वृष राशि का राशिफल
इस राशि वालों सूर्य का वृश्चिक राशि में यह प्रवेश आपके लिये भी अधिक शुभ नहीं है। यह आपको क्रोध दिलाने वाला हो सकता है। खराब स्थिति से बचाव के लिये अगले महीने की संक्रान्ति तक प्रतिदिन भोजन करने से पहले रोटी के टुकड़े की अग्नि में आहुति दें। इसके अलावा तांबे का एक चौकोर टुकड़ा जमीन के नीचे दबाएंगे, तो आपकी परेशानी जल्द ही हल होगी।
मिथुन राशि का राशिफल
इस राशि वालों सूर्य का यह गोचर आपके शत्रुओं की वृद्धि करेगा और आपको किसी रोग की संभावना भी हो सकती है। मन्दिर या किसी धर्मस्थल के बाहर कुत्ते के लिये भोजन रखने से या वहां पर कुछ न कुछ दान देते रहने से सूर्य की अशुभ स्थिति से बचाव होगा, साथ ही आपका स्वास्थ्य भी अच्छा बना रहेगा।   
कर्क राशि का राशिफल
इस राशि वालों सूर्य आपके पाचंवे घर में प्रवेश करने से आपके लिये हर तरह से शुभ साबित होगा। पढ़ाई में आपकी रुचि बढ़ेगी। संतान से पॉजिटिव रिजल्ट मिलेंगे, साथ ही गुरु का आशीर्वाद आपके ऊपर बना रहेगा। आपके अन्दर फैसला करने की ताकत बढ़ेगी और आपके जीवन में इस दौरान भरपूर प्यार रहेगा। अच्छे फलों को सुनिश्चित करने के लिये लाल मुंह वाले बन्दर की सेवा करें या किसी पक्षी को दाना डालें।  
सिंह राशि का राशिफल
इस राशि वालों सूर्य का यह गोचर आपको भूमि, भवन, वाहन और माता का सुख दिलायेगा। शुभ फलों को और भी शुभ बनाने के लिये अगली संक्रान्ति तक प्रतिदिन किसी गरीब को भोजन कराएं। दोनों टाइम या कम से कम एक समय करायें, ये आपकी श्रद्धा पर निर्भर करता है। साथ ही अगर आप कोई लोहे या लकड़ी का काम करने की सोच रहे हैं, तो अगले महीने तक के लिये टाल दें।
कन्या राशि का राशिफल
इस राशि वालों सूर्य की इस संक्रान्ति से आपके भाई-बहनों से सम्बन्ध खराब हो सकते हैं और आपको यश की हानि हो सकती है। खराब स्थिति से बचने के लिये अपना व्यवहार अच्छा बनाए रखें और गलत कामों में फंसने से बचें।   
तुला राशि का राशिफल
इस राशि वालों सूर्य आपके दूसरे खाने में प्रवेश करेगा। इससे आपके ससुराल पक्ष में कष्ट हो सकता है। हालांकि आपको धन लाभ भी होगा। बुरे फलों से बचने के लिये और अच्छी स्थिति सुनिश्चित करने के लिये नारियल तेल या बादाम किसी धर्मस्थल या मन्दिर में देते रहें। इससे आपकी परेशानियां जल्द ही हल होंगी।
वृश्चिक राशि का राशिफल
इस राशि वालों सूर्य का यह प्रवेश क्योंकि आपकी राशि में ही हो रहा है, तो यह आपके लिये निश्चित रूप से शुभ फल देने वाला होगा। आपको सुख मिलेगा। आपका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा, साथ ही आपका आत्मविश्वास बढ़ेगा। शुभ स्थिति सुनिश्चित रखने के लिये पैतृक घर में हैंड पम्प लगवाएं। 
धनु राशि का राशिफल
इस राशि वालों सूर्य की यह वृश्चिक संक्रान्ति आपके लिये व्यय कराने वाली होगी। आपके खर्चों में वृद्धि होगी। अपने खर्चों पर कंट्रोल रखने के लिये घर में पर्याप्त मात्रा में रोशनी रखें। साथ ही घर के बरामदे को खुला रखें, ताकि सूर्य की रोशनी भी घर के अन्दर आ सके। इसके अलावा दूसरों के द्वारा की गई गलती को इस दौरान भूलाने की कोशिश करें।   
मकर राशि का राशिफल
इस राशि वालों सूर्य के ग्यारहवें घर में इस प्रवेश से आपको कुछ फायदा और कुछ नुकसान हो सकता है। ग्यारहवां घर आमदनी और कामना पूर्ति का है। यह आपकी आमदनी में बढ़ोतरी करेगा, लेकिन इस घर का स्वामी अकारक होने से आपको थोड़ा नुकसान भी उठाना पड़ सकता है। अशुभ स्थिति से बचाव के लिये और शुभ स्थिति सुनिश्चित करने के लिये रात को 5 मूली या बादाम सिरहाने रखकर सोयें और अगले दिन किसी धर्मस्थल पर जाकर दे दें। साथ ही इस दौरान किसी से किये गये अपने वायदे को जरूर पूरा करें।  
कुंभ राशि का राशिफल
इस राशि वालों सूर्य का यह गोचर आपकी और आपके पिता की उन्नति का सूचक है। इस दौरान आपको नौकरी में पदोन्नति मिलेगी, आपके बिजनेस की तरक्की होगी और आपके पिता का सम्मान बढ़ेगा। आप सिर पर टॉपी या पगड़ी बांध सकते हैं।जिससे अच्छे फलों को सुनिश्चित करने सिर ढ़ककर रखना फायदेमंद होगा .। साथ ही अगले एक महीने तक अगर हो सके तो काले या नीले रंग के कपड़े पहनना अवॉयड करें।  
मीन राशि का राशिफल
इस राशि वालों सूर्य आपके भाग्य स्थान, यानी नवे स्थान पर गोचर करेगा। इसलिए आपकी कामयाबी का सितारा निश्चित रूप से चमकेगा। सूर्य की अच्छी स्थिति को मजबूत करने के लिये अगले एक महीने तक घर में पीतल के बर्तनों का प्रयोग करें और सफेद वस्तुओं का दान करें।  

Monday, November 13, 2017

उत्पन्ना एकादशी के कुछ खास उपाय

उत्पन्ना एकादशी से ही साल की एकादशी की शुरुआत होती है। इसे बहुत ही खास माना जाता है।   हर साल 24 एकादशी होती है। जिसे अपने-अपने नामों से जाना जाता है। मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष के दिन पड़ने वाली एकदाशी को उत्पन्ना एकादशी के रुप में मनाया जाता है। इस दिन एकादशी माता का जन्म हुआ था। जिसे उत्पन्ना एकादशी के रुप में मनाया जाता है।



एकादशी का व्रत नित्य और काम्य दोनों है। नित्य का मतलब है, जो व्रत गृहस्थ के लिए करना जरूरी हो और काम्य व्रत का मतलब है- जो किसी वांछित वस्तु की प्राप्ति, यानी कि जो ऐश्वर्य, संतति, स्वर्ग, मोक्ष की प्राप्ति के लिये किया जाये। जानिए आखिर एस एकादशी का नाम उत्पन्ना एकादशी क्यों पड़ा। इसके पीछे क्या है पौराणिक कथा।

एक बार मार्गशीर्ष मास की एकादशी के दिन असुरों से युद्ध के समय थकने पर भगवान विष्णु आराम करने बद्रिकाश्रम चले गये। वहां जब भगवान निद्रा अवस्था में थे, तो मुर नामक राक्षस ने उन्हें मारने का प्रयास करना चाहा, तभी विष्णु जी के शरीर से एक देवी का जन्म हुआ।

उन्होंने मुर नामक उस राक्षस का वध कर दिया। तब देवी से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि तुम्हारी उत्पत्ति एकादशी के दिन हुई है, इसलिए तुम्हें एकादशी के नाम से जाना जायेगा और इस एकादशी का नाम उत्पन्ना एकादशी होगा और जो व्यक्ति इस दिन व्रत करेगा, उसे हर तरह के मोह से छुटकारा मिलेगा और वह जीवन में तरक्की की सीढ़ी चढ़ता जायेगा।



एकादशी का व्रत नित्य और काम्य दोनों है। नित्य का मतलब है, जो व्रत गृहस्थ के लिए करना जरूरी हो और काम्य व्रत का मतलब है- जो किसी वांछित वस्तु की प्राप्ति, यानी कि जो ऐश्वर्य, संतति, स्वर्ग, मोक्ष की प्राप्ति के लिये किया जाये। यहां यह बात समझनी बहुत जरूरी है कि दोनों पक्षों की एकादशी पर व्रत केवल उनके लिये नित्य है, जो गृहस्थ नहीं है। गृहस्थों के लिये व्रत केवल शुक्ल पक्ष की एकादशी पर ही नित्य है, कृष्ण पक्ष में नहीं।


  1. अगर आप जल्दी ही किसी नये काम की शुरुआत करने जा रहे हैं, कोई नया बिजनेस स्टार्ट करना चाहते हैं तो आज के दिन भगवान विष्णु को अपने हाथों से बनी 21 पीले फूलों की माला बनाकर चढ़ाएं। धागे में एक-एक फूल पिरोते समय अपने काम की अच्छी शुरुआत के लिये भगवान से आशीर्वाद मांगे, आपके काम निश्चय ही पूरे होंगे।
  2. आपका सुख सौभाग्य हमेशा बना रहे, आपके जीवनसाथी की दिन-दुनी रात-चौगनी तरक्की होती रहे, इसके लिये आज के दिन लक्ष्मी मन्दिर में जाकर सोलह श्रृंगार के सामान से देवी को अपने हाथों से सजाएं और खोये से बनी मीठाई का भोग लगाएं।
  3. आपके शत्रु आपके निकट न आ सके, वे आपका अहित करने से पहले सौ बार सोचें, इसके लिये आज के दिन केसर और मिश्री मिले दूध से भगवान विष्णु को भोग लगाएं और भोग लगाते समय 'ऊँ मधुसूदनाय नमः' मंत्र का जाप करें।
  4. अच्छे स्वास्थ्य के लिये, बुरी नजर से बचाव के लिये आज के दिन एक रुपये का सिक्का लें और उसे पूजा से पहले भगवान विष्णु के चरणों में रख दें। पूजा के बाद उस सिक्के पर तिलक लगाकर अपनी जेब में रख लें। आपकी सेहत अच्छी बनी रहेगी।
  5. आपका सुख सौभाग्य हमेशा बना रहे, आपके जीवनसाथी की दिन-दुनी रात-चौगनी तरक्की होती रहे, इसके लिये आज के दिन लक्ष्मी मन्दिर में जाकर सोलह श्रृंगार के सामान से देवी को अपने हाथों से सजाएं और खोये से बनी मीठाई का भोग लगाएं।
  6. आपके शत्रु आपके निकट न आ सके, वे आपका अहित करने से पहले सौ बार सोचें, इसके लिये आज के दिन केसर और मिश्री मिले दूध से भगवान विष्णु को भोग लगाएं और भोग लगाते समय 'ऊँ मधुसूदनाय नमः' मंत्र का जाप करें।
  7. अच्छे स्वास्थ्य के लिये, बुरी नजर से बचाव के लिये आज के दिन एक रुपये का सिक्का लें और उसे पूजा से पहले भगवान विष्णु के चरणों में रख दें। पूजा के बाद उस सिक्के पर तिलक लगाकर अपनी जेब में रख लें। आपकी सेहत अच्छी बनी रहेगी।
  8. आपका सुख सौभाग्य हमेशा बना रहे, आपके जीवनसाथी की दिन-दुनी रात-चौगनी तरक्की होती रहे, इसके लिये आज के दिन लक्ष्मी मन्दिर में जाकर सोलह श्रृंगार के सामान से देवी को अपने हाथों से सजाएं और खोये से बनी मीठाई का भोग लगाएं।
  9. आपके शत्रु आपके निकट न आ सके, वे आपका अहित करने से पहले सौ बार सोचें, इसके लिये आज के दिन केसर और मिश्री मिले दूध से भगवान विष्णु को भोग लगाएं और भोग लगाते समय 'ऊँ मधुसूदनाय नमः' मंत्र का जाप करें।
  10. अच्छे स्वास्थ्य के लिये, बुरी नजर से बचाव के लिये आज के दिन एक रुपये का सिक्का लें और उसे पूजा से पहले भगवान विष्णु के चरणों में रख दें। पूजा के बाद उस सिक्के पर तिलक लगाकर अपनी जेब में रख लें। आपकी सेहत अच्छी बनी रहेगी।

Sunday, November 12, 2017

कलियुग में मोक्ष की प्राप्ति

वैदिक संस्कृति की परिकल्पना आज से हजारों वर्षो पूर्व वैदिक ऋषियों द्वारा की गई थी जिनका सृष्टिकर्ता के साथ सीधा संपर्क था। महर्षि वेद व्यास जी ने समाज में होने वाले अपकर्ष और संस्कृति पर आने वाले संकट का पूर्वानुमान लगाते हुए वेदों के ज्ञान को पुराणों के माध्यम से हमें 5000 वर्षो पूर्व लिखित रूप में दिया। इन सब पुराणों में ,श्रीमद देवीभागवत में विभिन्न युगों-सतयुग त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग की विस्तार से व्याख्या की गई है।



जो मनुष्य धर्म का पालन करते हैं वे सतयुग में जन्म लेते हैं। जिन मनुष्यों की प्रीति धर्म और अर्थ (भौतिक  सम्पन्नता ) दोनों में है वे त्रेतायुग में जन्म लेते है। जो धर्म, अर्थ और काम (इच्छाएं) तीनों में प्रीती रखते हैं वे द्वापर में जन्म लेते है तथा जो सिर्फ अर्थ और काम में लिप्त होते है वे कलियुग में जन्म लेते हैं। अतः सतयुग में योग-‘ज्ञानथा, त्रेता में ध्यान के माध्यम सेज्ञानप्राप्त हुआ। द्वापरयुग में कर्म प्रधान हुआ और श्री कृष्ण ने गीता के माध्यम से निष्काम कर्म सिखाया-प्रत्येक प्राणी की सहायता अनासक्त होकर करना। वर्तमान कलियुग का योग-सेवा है क्योंकि कर्म प्रधान है इसलिए जब हम सेवा करते हैं तो हमारे कर्म स्वतः ही सुधारते हैं। कर्म वह नहीं है की दूसरे के बारे में अच्छा विचार किया और फिर अपने भोगों में लिप्त हो गए। यह एक कृत्य है जोकि या तो सकारात्मक या फिर नकारात्मक हो सकता है।

जब आप दुसरो की सहायता करके अपने कर्म सुधारते हैं तब आप ध्यान के लिए योग्य बनते है और जब ध्यान होगा तब ही ज्ञान मिलेगा। जब ज्ञान मिलेगा तब आप मोक्ष प्राप्ति के योग्य बनेंगे। यदि हम अच्छे कर्म करते हैं तभी ध्यान कर पाते है और ध्यान के द्वारा ही ज्ञान की प्राप्ति होगी। जब मैं इतने सारे अपराध होते देखता हूं जानवरो को प्रताड़ित किया जा रहा है और प्राकृतिक संसाधनों को नष्ट किया जा रहा है। मेरे मनन में कोई शंका नहीं रहती की हम कलियुग के अंत के समीप हैं और कलियुग में मोक्ष का मार्ग केवल सेवा है-दुर्बल की रक्षा और सकुशल व्यस्था सेवा दो प्रकार की होती है। पहला जैसा आपको अच्छा लगता है वैसा करे, यह मार्ग आपको सिद्धियां धन दौलत और यश देगा। दूसरा सेवा मार्ग वो जोकि आपके गुरु द्वारा दिखाया गया  है। यदि आप इस मार्ग पर चलते हैं तो आपको मोक्ष प्राप्त होता है।

ध्यान रहे की चारों गुरू युगों में कलियुग सबसे भौतिकवादी है परंतु इस युग में मोक्ष प्राप्त करना सबसे आसान है। गुरु के वाक्य के अनुसार यदि आप छोटा सा सेवा और दान का कृत्य भी करते है तो उसका फल बहुरूपता में मिलता है। सनातन क्रिया का नियमित अभ्यास गुरु तत्त्व के साथ संपर्क प्रत्यास्थापित करता है और आपको गुरु द्वारा बनाए मार्ग पर चलने में सक्षम करता है।


Thursday, November 9, 2017

कालभैरव अष्टमी

अगहन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को कालभैरव अष्टमी मनाई जाती है। इस दिन भगवान काल भैरव का जन्म हुआ था। शिव पुराण के अनुसार कालभैरव को भगवान शिव का अवतार माना जाता है। कालान्तर में भैरव-उपासना की दो शाखाएं- बटुक भैरव तथा काल भैरव के रूप में प्रसिद्ध हुईं। जहां बटुक भैरव अपने भक्तों को अभय देने वाले सौम्य स्वरूप में विख्यात हैं वहीं काल भैरव आपराधिक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने वाले प्रचण्ड दंडनायक के रूप में प्रसिद्ध हुए। ये भगवान शंकर के दूसरे रूप हैं। इनकी पूजा से घर में नकारत्मक ऊर्जा, जादू-टोने, भूत-प्रेत आदि का भय नहीं रहता।



कोलतार से भी गहरा काला रंग, विशाल प्रलंब, स्थूल शरीर, अंगारकाय त्रिनेत्र, काले डरावने चोगेनुमा वस्त्र, रूद्राक्ष की कण्ठमाला, हाथों में लोहे का भयानक दण्ड और काले कुत्ते की सवारी - यह है महाभैरव, अर्थात् मृत्यु-भय के भारतीय देवता का बाहरी स्वरूप।

उपासना की दृष्टि से भैरव तमस देवता हैं। उनको बलि दी जाती है और जहाँ कहीं यह प्रथा समाप्त हो गयी है वहाँ भी एक साथ बड़ी संख्या में नारियल फोड़ कर इस कृत्य को एक प्रतीक के रूप में सम्पन्न किया जाता है। यह एक ऐतिहासिक सत्य है कि भैरव उग्र कापालिक सम्प्रदाय के देवता हैं और तंत्रशास्त्र में उनकी आराधना को ही प्राधान्य प्राप्त है। तंत्र साधक का मुख्य लक्ष्य भैरव भाव से अपने को आत्मसात करना होता है।

तंत्रशास्त्र में अष्ट-भैरव का उल्लेख है – असितांग-भैरव, रुद्र-भैरव, चंद्र-भैरव, क्रोध-भैरव, उन्मत्त-भैरव, कपाली-भैरव, भीषण-भैरव तथा संहार-भैरव।

कालिका पुराण में भैरव को नंदी, भृंगी, महाकाल, वेताल की तरह भैरव को शिवजी का एक गण बताया गया है जिसका वाहन कुत्ता है। ब्रह्मवैवर्तपुराण में भी १ . महाभैरव, २ . संहार भैरव, ३ . असितांग भैरव, ४ . रुद्र भैरव, ५ . कालभैरव, ६ . क्रोध भैरव, ७ . ताम्रचूड़ भैरव तथा ८ . चंद्रचूड़ भैरव नामक आठ पूज्य भैरवों का निर्देश है। भैरवों की संख्या ६४ है। ये ६४ भैरव भी ८ भागों में विभक्त हैं।इनकी पूजा करके मध्य में नवशक्तियों की पूजा करने का विधान बताया गया है। शिवमहापुराण में भैरव को परमात्मा शंकर का ही पूर्णरूप बताते हुए लिखा गया है -

भैरव: पूर्णरूपोहि शंकरस्य परात्मन:।
मूढास्तेवै न जानन्ति मोहिता:शिवमायया॥

कालभैरव की पूजाप्राय: पूरे देश में होती है और अलग-अलग अंचलों में अलग-अलग नामों से वह जाने-पहचाने जाते हैं। महाराष्ट्र में खण्डोबा उन्हीं का एक रूप है और खण्डोबा की पूजा-अर्चना वहाँ ग्राम-ग्राम में की जाती है। दक्षिण भारत में भैरव का नाम शास्ता है। वैसे हर जगह एक भयदायी और उग्र देवता के रूप में ही उनको मान्यता मिली हुई है और उनकी अनेक प्रकार की मनौतियां भी स्थान-स्थान पर प्रचलित हैं। भूत, प्रेत, पिशाच, पूतना, कोटरा और रेवती आदि की गणना भगवान शिव के अन्यतम गणों में की जाती है। दूसरे शब्दों में कहें तो विविध रोगों और आपत्तियों विपत्तियों के वह अधिदेवता हैं। शिव प्रलय के देवता भी हैं, अत: विपत्ति, रोग एवं मृत्यु के समस्त दूत और देवता उनके अपने सैनिक हैं। इन सब गणों के अधिपति या सेनानायक हैं महाभैरव। सीधी भाषा में कहें तो भय वह सेनापति है जो बीमारी, विपत्ति और विनाश के पार्श्व में उनके संचालक के रूप में सर्वत्र ही उपस्थित दिखायी देता है।

भैरव की उत्पत्ति

‘शिवपुराण’ के अनुसार मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को मध्यान्ह में भगवान शंकर के अंश से भैरव की उत्पत्ति हुई थी, अतः इस तिथि को काल-भैरवाष्टमी के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार अंधकासुर नामक दैत्य अपने कृत्यों से अनीति व अत्याचार की सीमाएं पार कर रहा था, यहाँ तक कि एक बार घमंड में चूर होकर वह भगवान शिव तक के ऊपर आक्रमण करने का दुस्साहस कर बैठा. तब उसके संहार के लिए शिव के रुधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई।

कुछ पुराणों के अनुसार शिव के अपमान-स्वरूप भैरव की उत्पत्ति हुई थी। यह सृष्टि के प्रारंभकाल की बात है। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा ने भगवान शंकर की वेशभूषा और उनके गणों की रूपसज्जा देख कर शिव को तिरस्कारयुक्त वचन कहे। अपने इस अपमान पर स्वयं शिव ने तो कोई ध्यान नहीं दिया, किन्तु उनके शरीर से उसी समय क्रोध से कम्पायमान और विशाल दण्डधारी एक प्रचण्डकाय काया प्रकट हुई और वह ब्रह्मा का संहार करने के लिये आगे बढ़ आयी। स्रष्टा तो यह देख कर भय से चीख पड़े। शंकर द्वारा मध्यस्थता करने पर ही वह काया शांत हो सकी। रूद्र के शरीर से उत्पन्न उसी काया को महाभैरव का नाम मिला। बाद में शिव ने उसे अपनी पुरी, काशी का नगरपाल नियुक्त कर दिया। ऐसा कहा गया है कि भगवान शंकर ने इसी अष्टमी को ब्रह्मा के अहंकार को नष्ट किया था, इसलिए यह दिन भैरव अष्टमी व्रत के रूप में मनाया जाने लगा। भैरव अष्टमी 'काल' का स्मरण कराती है, इसलिए मृत्यु के भय के निवारण हेतु बहुत से लोग कालभैरव की उपासना करते हैं। ऐसा भी कहा जाता है की ,ब्रह्मा जी के पांच मुख हुआ करते थे तथा ब्रह्मा जी पांचवे वेद की भी रचना करने जा रहे थे,सभी देवो के कहने पर महाकाल भगवान शिव ने जब ब्रह्मा जी से वार्तालाप की परन्तु ना समझने पर महाकाल से उग्र,प्रचंड रूप भैरव प्रकट हुए और उन्होंने नाख़ून के प्रहार से ब्रह्मा जी की का पांचवा मुख काट दिया, इस पर भैरव को ब्रह्मा हत्या का पाप भी लगा,

कालभैरव के जन्म को लेकर पुराणों में एक बड़ी ही रोचक कथा है। शिव पुराण के अनुसार एक बार सभी देवताओं ने ब्रह्मा और विष्णु जी से बारी-बारी से पूछा कि जगत में सबसे श्रेष्ठ कौन है तब दोनो ने अपने को श्रेष्ठ बताया और आपस में इसके लिए एक दूसरे युद्ध करने लगे। इसके बाद सभी देवताओं ने वेदशास्त्रों से पूछा तो उत्तर आया कि जिनके भीतर चराचर जगत, भूत, भविष्य और वर्तमान समाया हुआ है अनादि अंनत और अविनाशी तो भगवान रूद्र ही हैं।

वेद शास्त्रों से शिव के बारे में यह सब सुनकर ब्रह्मा ने अपने पांचवें मुख से शिव के बारे में भला-बुरा कहा। इससे वेद दुखी हुए। इसी समय एक दिव्यज्योति के रूप में भगवान रूद्र प्रकट हुए। ब्रह्मा ने कहा कि हे रूद्र तुम मेरे ही सिर से पैदा हुए हो। अधिक रुदन करने के कारण मैंने ही तुम्हारा नाम 'रूद्र' रखा है अतः तुम मेरी सेवा में आ जाओ। ब्रह्मा के इस आचरण पर शिव को भयानक क्रोध आया और उन्होंने भैरव को उत्पन्न करके कहा कि तुम ब्रह्मा पर शासन करो।  शिव ने उससे कहा कि “काल भैरव’ तुम साक्षात “काल’ के भी कालराज हो। तुम विश्व का भरण करनें में समर्थ होंगे, अतः तुम्हारा नाम “भैरव’ भी होगा। तुमसे काल भी डरेगा, इसलिए तुम्हें “काल भैरव’ भी कहा जाएगा। दुष्टात्माओं का तुम नाश करोगे, अतः तुम्हें “आमर्दक’ नाम से भी लोग जानेंगे। हमारे और अपने भक्तों के पापों का तुम तत्क्षण भक्षण करोगे, फलतः तुम्हारा एक नाम “पापभक्षण’ भी होगा।


उस दिव्य शक्ति संपन्न भैरव ने अपने बाएं हाथ की सबसे छोटी अंगुली के नाखून से शिव के प्रति अपमान जनक शब्द कहने वाले ब्रह्मा के पांचवे सर को ही काट दिया। इस पर भगवान शंकर ने अपनी दूसरी मूर्ति भैरव से कहा कि तुम ब्रह्मा के इस कपाल को धारण करो। तुम्हें अब ब्रह्म- हत्या लगी है। इसके निवारण हेतु “कापालिक’ व्रत ग्रहण कर लोगों को शिक्षा देने के लिए सर्वत्र भिक्षा माँगो और कापालिक वेश में भ्रमण करो। ब्रह्मा के उस कपाल को अपने हाथों में लेकर कपर्दी भैरव चले और हत्या उनके पीछे चली। हत्या लगते ही भैरव काले पड़ गये। तीनो लोक में भ्रमण करते हुए वह काशी आये। श्री भैरव काशी की सीमा के भीतर चले आये, परंतु उनके पीछे आने वाली हत्या वहीं सीमा पर रुक गयी। वह प्रवेश नहीं कर सकी। फलतः वहीं पर वह धरती में चिग्घाड़ मारते हुए समा गयी। हत्या के पृथ्वी में धंसते ही भैरव के हाथ में ब्रह्मा का मस्तक गिर पड़ा। ब्रह्म- हत्या से पिण्ड छूटा, इस प्रसन्नता में भैरव नाचने लगे। बाद में ब्रह्म कपाल ही कपाल मोचन तीर्थ नाम से विख्यात हुआ और वहाँ पर कपर्दी भैरव, कपाल भैरव नाम से (लाट भैरव) अब काशी में विख्यात हैं। यहाँ पर श्री काल भैरव काशीवासियों के पापों का भक्षण करते हैं। कपाल भैरव का सेवक पापों से भय नहीं खाता।

भगवान शंकर ने कहा कि हे कालराज ! हमारी सबसे बड़ी मुक्ति पुरी “काशी’ में तुम्हारा आधिपत्य रहेगा। वहाँ के पापियों को तुम्हीं दण्ड दोगे, क्योंकि “चित्रगुप्त’ काशीवासियों के पापों का लेखा- जोखा नहीं रख सकेंगे। वह सब तुम्हें ही रखना होगा।

शिव के कहने पर भैरव काशी प्रस्थान किये जहां ब्रह्म हत्या से मुक्ति मिली। रूद्र ने इन्हें काशी का कोतवाल नियुक्त किया। आज भी ये काशी के कोतवाल के रूप में पूजे जाते हैं। इनका दर्शन किये वगैर विश्वनाथ का दर्शन अधूरा रहता है।

काशीवासी भैरव के सेवक होने के कारण कलि और काल से नहीं डरते। भैरव के समीप अगहन बदी अष्टमी को उपवास करते हुए रात्रि में जागरण करने वाला मनुष्य महापापों से मुक्त हो जाता है। भैरव के सेवकों से यमराज भय खाते हैं। काशी में भैरव का दर्शन करने से सभी अशुभ कर्म भ हो जाते हैं। सभी जीवों के जन्मांतरों के पापों का नाश हो जाता है। अगहन की अष्टमी को विधिपूर्वक पूजन करने वालों के पापों का नाश श्री भैरव करते हैं। मंगलवार या रविवार को जब अष्टमी या चतुर्दशी तिथि पड़े, तो काशी में भैरव की यात्रा अवश्य करनी चाहिए। इस यात्रा के करने से जीव समस्त पापो से मुक्त हो जाता है। जो मूर्ख काशी में भैरव के भक्तों को कष्ट देते हैं, उन्हें दुर्गति भोगनी पड़ती है। जो मनुष्य श्री विश्वेश्वर की भक्ति करता है तथा भैरव की भक्ति नहीं करता, उसे पग- पग पर कष्ट भोगना पड़ता है। पापभक्षण भैरव की प्रतिदिन आठ प्रदक्षिणा करनी चाहिए। आमर्दक पीठ पर छः मास तक जो लोग अपने इष्ट देव का जप करते हैं, वे समस्त वाचिक, मानसिक एवं कायिक पापों में लिप्त नहीं होते। काशी में वास करते हुए, जो भैरव की सेवा, पूजा या भजन नहीं करे, उनका पतन होता है।
श्री भैरवनाथसाक्षात् रुद्र हैं। शास्त्रों के सूक्ष्म अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि वेदों में जिस परमपुरुष का नाम रुद्र है, तंत्रशास्त्रमें उसी का भैरव के नाम से वर्णन हुआ है। तन्त्रालोक की विवेकटीका में भैरव शब्द की यह व्युत्पत्ति दी गई है- बिभíत धारयतिपुष्णातिरचयतीतिभैरव: अर्थात् जो देव सृष्टि की रचना, पालन और संहार में समर्थ है, वह भैरव है। शिवपुराणमें भैरव को भगवान शंकर का पूर्णरूप बतलाया गया है। तत्वज्ञानी भगवान शंकर और भैरवनाथमें कोई अंतर नहीं मानते हैं। वे इन दोनों में अभेद दृष्टि रखते हैं।

प्रसिद्ध मंदिर

भारत में भैरव के प्रसिद्ध मंदिर हैं जिनमें काशी का काल भैरव मंदिर सर्वप्रमुख माना जाता है। काशी विश्वनाथ मंदिर से भैरव मंदिर कोई डेढ़-दो किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। दूसरा नई दिल्ली के विनय मार्ग पर नेहरू पार्क में बटुक भैरव का पांडवकालीन मंदिर अत्यंत प्रसिद्ध है। तीसरा उज्जैन के काल भैरव की प्रसिद्धि का कारण भी ऐतिहासिक और तांत्रिक है। नैनीताल के समीप घोड़ाखाल का बटुकभैरव मंदिर भी अत्यंत प्रसिद्ध है। यहाँ गोलू देवता के नाम से भैरव की प्रसिद्धि है। इसके अलावा शक्तिपीठों और उपपीठों के पास स्थित भैरव मंदिरों का महत्व माना गया है। जयगढ़ के प्रसिद्ध किले में काल-भैरव का बड़ा प्राचीन मंदिर है जिसमें भूतपूर्व महाराजा जयपुर के ट्रस्ट की और से दैनिक पूजा-अर्चना के लिए पारंपरिक-पुजारी नियुक्त हैं। मध्य प्रदेश के सिवनी जिले के ग्राम अदेगाव में भी श्री काल भैरव का मंदिर है जो किले के अंदर है जिसे गढ़ी ऊपर के नाम से जाना जाता है।

कहते हैं औरंगजेब के शासन काल में जब काशी के भारत-विख्यात विश्वनाथ मंदिर का ध्वंस किया गया, तब भी कालभैरव का मंदिर पूरी तरह अछूता बना रहा था। जनश्रुतियों के अनुसार कालभैरव का मंदिर तोड़ने के लिये जब औरंगज़ेब के सैनिक वहाँ पहुँचे तो अचानक पागल कुत्तों का एक पूरा समूह कहीं से निकल पड़ा था। उन कुत्तों ने जिन सैनिकों को काटा वे तुरंत पागल हो गये और फिर स्वयं अपने ही साथियों को उन्होंने काटना शुरू कर दिया। बादशाह को भी अपनी जान बचा कर भागने के लिये विवश हो जाना पड़ा। उसने अपने अंगरक्षकों द्वारा अपने ही सैनिक सिर्फ इसलिये मरवा दिये किं पागल होते सैनिकों का सिलसिला कहीं खु़द उसके पास तक न पहुँच जाए।

उपासना 

भैरवाष्टमी या कालाष्टमी के दिन पूजा उपासना द्वारा सभी शत्रुओं और पापी शक्तियों का नाश होता है और सभी प्रकार के पाप, ताप एवं कष्ट दूर हो जाते हैं. भैरवाष्टमी के दिन व्रत एवं षोड्षोपचार पूजन करना अत्यंत शुभ एवं फलदायक माना जाता है. इस दिन श्री कालभैरव जी का दर्शन-पूजन शुभ फल देने वाला होता है.

भैरव जी की पूजा उपासना मनोवांछित फल देने वाली होती है. यह दिन साधक भैरव जी की पूजा अर्चना करके तंत्र-मंत्र की विद्याओं को पाने में समर्थ होता है. यही सृष्टि की रचना, पालन और संहारक हैं. इनका आश्रय प्राप्त करके भक्त निर्भय हो जाता है तथा सभी कष्टों से मुक्त रहता है.

पूजन 

भगवान शिव के इस रुप की उपासना षोड्षोपचार पूजन सहित करनी चाहिए. रात्री समय जागरण करना चाहिए व इनके मंत्रों का जाप करते रहना चाहिए. भजन कीर्तन करते हुए भैरव कथा व आरती की जाती है. इनकी प्रसन्नता हेतु इस दिन काले कुत्ते को भोजन कराना शुभ माना जाता है. मान्यता अनुसार इस दिन भैरव जी की पूजा व व्रत करने से समस्त विघ्न समाप्त हो जाते हैं, भूत, पिशाच एवं काल भी दूर रहता है.

भैरव उपासना क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त करती है. भैरव देव जी के राजस, तामस एवं सात्विक तीनों प्रकार के साधना तंत्र प्राप्त होते हैं. भैरव साधना स्तंभन, वशीकरण, उच्चाटन और सम्मोहन जैसी तांत्रिक क्रियाओं के दुष्प्रभाव को नष्ट करने के लिए कि जाती है. इनकी साधना करने से सभी प्रकार की तांत्रिक क्रियाओं के प्रभाव नष्ट हो जाते हैं.

साधना महत्व

इन्हीं से भय का नाश होता है और इन्हीं में त्रिशक्ति समाहित हैं. हिंदू देवताओं में भैरव जी का बहुत ही महत्व है यह दिशाओं के रकक्षक और काशी के संरक्षक कहे जाते हैं. कहते हैं कि भगवान शिव से ही भैरव जी की उत्पत्ति हुई. यह कई रुपों में विराजमान हैं बटुक भैरव और काल भैरव यही हैं. इन्हें रुद्र, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहारक भी कहा जाता है. भैरव को भैरवनाथ भी कहा जाता है और नाथ सम्प्रदाय में इनकी पूजा का विशेष महत्व रहा है.

भैरव आराधना से शत्रु से मुक्ति, संकट, कोर्ट-कचहरी के मुकदमों में विजय प्राप्त होती है, व्यक्ति में साहस का संचार होता है. इनकी आराधना से ही शनि का प्रकोप शांत होता है, रविवार और मंगलवार के दिन इनकी पूजा बहुत फलदायी है. भैरव साधना और आराधना से पूर्व अनैतिक कृत्य आदि से दूर रहना चाहिए पवित्र होकर ही सात्विक आराधना की जाती है तभी फलदायक होती है. भैरव तंत्र में भैरव पद या भैरवी पद प्राप्त करने के लिए भगवान शिव ने देवी के समक्ष अनेक विधियों का उल्लेख किया जिनके माध्यम से उक्त अवस्था को प्राप्त हुआ जा सकता है.

भैरव जी शिव और दुर्गा के भक्त हैं व इनका चरित्र बहुत ही सौम्य, सात्विक और साहसिक माना गया है न की डर उत्पन्न करने वाला इनका कार्य है सुरक्षा करना और कमजोरों को साहस देना व समाज को सही मार्ग देना. काशी में स्थित भैरव मंदिर सर्वश्रेष्ठ स्थान पाता है. इसके अलावा शक्तिपीठों के पास स्थित भैरव मंदिरों का महत्व माना गया है माना जाता है कि इन्हें स्वयं भगवान शिव ने स्थापित किया था.

उनकी प्रिय वस्तुओं में काले तिल, उड़द, नींबू, नारियल, अकौआ के पुष्प, कड़वा तेल, सुगंधित धूप, पुए, मदिरा, कड़वे तेल से बने पकवान दान किए जा सकते हैं। इस दिन भैरवजी के वाहन श्वान को गुड़ खिलाने का विशेष महत्व है।

इस मंत्र का करें जाप

अतिक्रूर महाकाय कल्पान्त दहनोपम्,
भैरव नमस्तुभ्यं अनुज्ञा दातुमर्हसि!!

Tuesday, November 7, 2017

रसखान

रसखान अर्थात रस की खान उसमें कवि हृदय भगवतभक्त और कृष्णमार्गी व्यक्तित्व का नाम था जिसने यशोदानन्दन श्रीकृष्ण की भक्ति में अपना समस्त जीवन व्यतीत कर दिया था | भक्त शिरोमणि रसखान का कनम विक्रमी संवत 1635 (सन 1578) में हुआ था | इनका परिवार भी भगवतभक्त था | पठान कुल में जन्मे रसखान को माता पिता के स्नेह के साथ साथ सुख ऐश्वर्य भी मिले | घर में कोई अभाव नही था |




चूँकि परिवार भर में भगवत भक्ति के संस्कार थे ,इस कारण रसखान को भी बचपन में धार्मिक जिज्ञासा विरासत में मिली थी | बृज के ठाकुर नटवरनागर नन्द किशोर भगवान कृष्ण पर इनकी अगाध श्रुदा थी | एक बार कही भगवतकथा का आयोजन हो रहा था |व्यास गद्दी पर बैठे कथा वाचक बड़ी ही सुबोध और सरल भाषा में महिमामय भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओ का सुंदर वर्णन कर रहे थे | उनके समीप ही बृजराज श्याम सुंदर का मनोहारी चित्र रखा था |

रसखान भी उस समय कथा श्रवण करने पहुचे | ज्यो ही उनकी दृष्टि व्यास गद्दी के समीप रखे कृष्ण कन्हैया के चित्र पर पड़ी | वह जैसे स्तभित रह गये | उनके नेत्र भगवान के रूप में माधुर्य को निहारते गये जैसे चुम्बक लोहे को अपनी तरफ खींचता है |उसी प्रकार रसखान का हृदय मनमोहन की मोहिनी सुरत की तरफ खींचा जा रहा था | कथा की समाप्ति पर रसखान एकटक उन्हें ही देखते रहे |

जब सब लोग चले गये तो व्यासजी ने उनकी तरफ देखा और जब उनकी अपलक दृष्टि का केंद्र देखा तो व्यास महाराज मुस्कुराने लगे | वह उठकर रसखान के पास आये |

“वत्स ! क्या देख रहे हो ?” उन्होंने सप्रेम पूछा |

रसखान ने प्रश्न पूछा  “पंडित जी ,सामने रखा चित्र भगवान श्रीकृष्ण का ही है न ”

व्यासजी ने कहा “हाँ ! यही उन्ही नटवर नागर का चित्र है ”

रसखान गदगद कंठ से बोले | “कितना सुंदर चित्र है | क्या कोई इतना दर्शनीय और मनभावन भी हो सकता है ?”

व्यासजी ने कहा “जिसने इतनी दर्शनीय सृष्टि का निर्माण कर दिया वह दर्शनीय और मनभावन तो होगा ही ”

अब रसखान ने कहा “पंडित जी , यह मनमोहिनी सुरत मेरे हृदय में बस गयी है | यह साक्षात इस अद्भुद मुखमंडल के दर्शन करने का अभिलाषी हु | क्या आप मुझे उनका पता बता सकते हो ?”

व्यासजी ने कहा “वत्स ब्रज के नायक तप ब्रज में ही मिलेंगे न ”

रसखान जी ने कहा “फिर तो मै ब्रज को ही जाता हु ”

जिसके हृदय में भाव जागृत हुए और प्रभु से मिलने की उत्कंठा तीव्र हो जाए ,उसे संसार में कुछ ओर दिखाई नही पड़ता है | रसखान भी ब्रज की तरफ चल पड़े और वृन्दावन धाम में जाकर ही निवास किया | ब्रज की रज से स्पर्श होते ही मलिनता नष्ट हो जाती है |

भगवती कलिन्दी के पवन जल की पवित्र शीतलता के स्पर्श से ही रसखान के भावपूर्ण हृदय में प्रेमोवेग से कम्पन्न होने लगा | वृन्दावन के कण कण से गूंजती कृष्णनाम की सुरीली धुन ने उन्हें भाव विभोर कर दिया | धामों में धाम परमधाम वृन्दावन जैसे स्वर्ग की अनुभूति करा रहा था | रसखान ने इस दिव्यधाम की अनुभूति को अपने पद में ऐसे व्यक्त किया

या लकुटीअरु कमरिया पर राज तिहु पुर कौ तजि डारो |
आठहु सिद्दी नवो निधि कौ सुख नन्द की गाय चराय बिसारो |
रसखान सदा इन नयनहि सौ बृज के वन तडाग निहारौ |
कोनही कलधौत के धाम करील को कुंजन उपर वरौ |

फिर रसखान के हृदय में गिरधारी के गिरी गोवर्धन को देखने की इच्छा हुयी तो यह गोवर्धन जा पहुचे | वहा श्रीनाथ जी के दर्शनों के लिए मन्दिर में घुसने लगे |

“अरे-रे …रे…रे … कहा घुसे जा रहे हो ?” द्वारपाल ने टोक दिया “तुम्हारी वेशभूषा तो दुसरी है तुम मन्दिर में नही जा सकते हो ”

“यह कैसा प्रतिबंध !  वेशभूषा से भक्ति का क्या संबध ?”

“मै कुछ नही सुनना चाहता | मै तुम्हे अंदर नही घुसने दूंगा  ”

“भाई मै भी इन्सान ही हु | तुम्हारे ही तरह मैंने भी एक स्त्री के गर्भ से जन्म लिया है |तुम्हारी ही तरह ईश्वर ने मुझे भी भजन सुमरिन और दर्शन का अधिकार दिया है फिर तुम मुझे प्रभु के दर्शनों से क्यों वंचित रखना चाहते हो ?”

“अपने ये तर्क किसी ओर को सुनाना | मै विधर्मी को मन्दिर में नही घुसने दे सकता हु मै इसलिए तैनात हु ”

“परन्तु  | ”

“तुम इस प्रकार नही मानोगे ” द्वारपाल ने गुस्से से रसखान को सीढियों से धक्का दे दिया |रसखान उस व्यवहार पर व्यथित तो हुए और उन्हें आश्चर्य भी हुआ कि ब्रज में ऐसी मतिबुद्धि वाले इन्सान भी रहते है परन्तु उन्हें श्याम सखा पर उन्हें विश्वास था |रसखान ने अपने को पुरी तरह से अपने कृष्ण सखा के हवाले करके अन्न जल त्याग दिया

देस बिदेस के देख नरेसन ,रीझी की कोऊ न बुझ करैगो |
ताते तिन्हे तजजि जान गिरयो ,गुन सौ गुन औगुन गंठी परैगो |
बांसुरी वारों बडो रिसवार है श्याम जो नैकु सुटार ठरैगो |
लाडिलो छैल वही तो अहीर को पीर हमारे हिये हरैगो |

भगवान भी कब  अपने भक्त की हृदय वेदना से अनभिज्ञ थे | भक्त की विकलता तो भगवान को भी विकल कर देती है |प्राण वल्लभ भगवान श्रीकृष्ण ने अपने भक्त की विरलता का आभास किया और भक्त की सारी पीड़ा हर ली | हरि का तो यही कार्य होता है | भक्त के समक्ष साक्षात प्रकट होकर भगवान ने द्वारपाल के दुर्व्यवहार की क्षमा माँगी | फिर रसखान को गौसाई विट्ठलनाथ जी के पास जाने का आदेश दिया |

रसखान प्रभु का आदेश पाकर गोसाई जी के पास पहुचे  और उन्होंने उन्हें गोविदकुंड में स्नान कराकर दीक्षित किया | फिर तो जैसे रसखान के अंदर भक्ति काव्य के स्त्रोत फुट पड़े | आजीवन भगवान कृष्ण की लीला को काव्य के रूप में वर्णन करते हुए ब्रज रहे | केवल भगवान ही उनके सखा था ,संबधी थे ,मित्र थे | अन्य कोई चाह नही थी | कोई लालसा नही थी | परन्तु एक इच्छा जो उनके पदों में स्पस्ट झलकती है कि वह जन्म जन्मान्तर ब्रज की भूमि पर ही जन्म लेने की थी |

मानुष हो तो वही “रसखान ” बसों बृज गोकुल गाँव के गवारन
जो पसु हो तो कहा बस मेरो चरो नितनदं की धेनु मंझारण |
पाहन हौ तो वही गिरी को जो धरयो कर छत्र पुरन्दर कारन |
जो खग हो तो बसेरो करो नित कालिंदी फुल कदम्ब की डारन |




भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने जिन मुस्लिम हरिभक्तों के लिये कहा था, "इन मुसलमान हरिजनन पर कोटिन हिन्दू वारिए" उनमें रसखान का नाम सर्वोपरि है। बोधा और आलम भी इसी परम्परा में आते हैं। सय्यद इब्राहीम "रसखान" का जन्म अन्तर्जाल पर उपलब्ध स्रोतों के अनुसार सन् १५३३ से १५५८ के बीच कभी हुआ था। कई विद्वानों के अनुसार इनका जन्म सन् १५९० ई. में हुआ था। चूँकि अकबर का राज्यकाल १५५६-१६०५ है, ये लगभग अकबर के समकालीन हैं। इनका जन्म स्थान पिहानी जो कुछ लोगों के मतानुसार दिल्ली के समीप है। कुछ और लोगों के मतानुसार यह पिहानी उत्तरप्रदेश के हरदोई जिले में है। मृत्यु के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई। यह भी बताया जाता है कि रसखान ने भागवत का अनुवाद फारसी और हिंदी में किया है ।

सखान कृष्ण भक्त मुस्लिम कवि थे। हिन्दी के कृष्ण भक्त तथा रीतिकालीन रीतिमुक्त कवियों में रसखान का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है। रसखान को 'रस की खान' कहा गया है। इनके काव्य में भक्ति, शृंगार रस दोनों प्रधानता से मिलते हैं। रसखान कृष्ण भक्त हैं और उनके सगुण और निर्गुण निराकार रूप दोनों के प्रति श्रद्धावनत हैं। रसखान के सगुण कृष्ण वे सारी लीलाएं करते हैं, जो कृष्ण लीला में प्रचलित रही हैं। यथा- बाललीला, रासलीला, फागलीला, कुंजलीला आदि। उन्होंने अपने काव्य की सीमित परिधि में इन असीमित लीलाओं को बखूबी बाँधा है। मथुरा जिले में महाबन में इनकी समाधि हैं|

रसखान के जन्म के सम्बंध में विद्वानों में मतभेद पाया जाता है। अनेक विद्वानों इनका जन्म संवत् 1615 ई. माना है और कुछ ने 1630 ई. माना है। रसखान के अनुसार गदर के कारण दिल्ली श्मशान बन चुकी थी, तब दिल्ली छोड़कर वह ब्रज (मथुरा) चले गए। ऐतिहासिक साक्ष्य के आधार पर पता चलता है कि उपर्युक्त गदर सन् 1613 ई. में हुआ था। उनकी बात से ऐसा प्रतीत होता है कि वह उस समय वयस्क हो चुके थे।

रसखान का जन्म संवत् 1590 ई. मानना अधिक समीचीन प्रतीत होता है। भवानी शंकर याज्ञिक का भी यही मानना है। अनेक तथ्यों के आधार पर उन्होंने अपने मत की पुष्टि भी की है। ऐतिहासिक ग्रंथों के आधार पर भी यही तथ्य सामने आता है। यह मानना अधिक प्रभावशाली प्रतीत होता है कि रसखान का जन्म सन् 1590 ई. में हुआ था।

रसखान के जन्म स्थान के विषय में भी कई मतभेद है। कई विद्वान उनका जन्म स्थल पिहानी अथवा दिल्ली को मानते है। शिवसिंह सरोज तथा हिन्दी साहित्य के प्रथम इतिहास तथा ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर रसखान का जन्म स्थान पिहानी जिला हरदोई माना जाए।

रसखान अर्थात् रस के खान, परंतु उनका असली नाम सैयद इब्राहिम था और उन्होंने अपना नाम केवल इस कारण रखा ताकि वे इसका प्रयोग अपनी रचनाओं पर कर सकें। कृष्ण-भक्ति ने उन्हें ऐसा मुग्ध कर दिया कि गोस्वामी विट्ठलनाथ से दीक्षा ली और ब्रजभूमि में जा बसे। सन् 1628 के लगभग उनकी मृत्यु हुई।
सुजान रसखान और प्रेमवाटिका उनकी उपलब्ध कृतियाँ हैं। रसखान रचनावली के नाम से उनकी रचनाओं का संग्रह मिलता है।

प्रमुख कृष्णभक्त कवि रसखान की अनुरक्ति न केवल कृष्ण के प्रति प्रकट हुई है बल्कि कृष्ण-भूमि के प्रति भी उनका अनन्य अनुराग व्यक्त हुआ है। उनके काव्य में कृष्ण की रूप-माधुरी, ब्रज-महिमा, राधा-कृष्ण की प्रेम-लीलाओं का मनोहर वर्णन मिलता है। वे अपनी प्रेम की तन्मयता, भाव-विह्नलता और आसक्ति के उल्लास के लिए जितने प्रसिद्ध हैं उतने ही अपनी भाषा की मार्मिकता, शब्द-चयन तथा व्यंजक शैली के लिए। उनके यहाँ ब्रजभाषा का अत्यंत सरस और मनोरम प्रयोग मिलता है, जिसमें ज़रा भी शब्दाडंबर नहीं है।

यह उनकी इच्छा थी कि उन्हें किसी भी योनी में जन्म मिले पर जन्म भूमि ब्रज ही हो | उच्च कोटि के काव्य और भक्ति के धनी रसखान ने प्रभु स्मरण करते हुए 45 वर्ष की आयु में निजधाम की यात्रा की ,जिनके दर्शनों के लिए कितने ही योगी सिध्पुरुष तरसा करते है | उन्ही भगवान श्रीकृष्ण भक्तवत्सल भगवान ने अपने हाथो से अपने इस भक्त की अंत्येष्टि कर भक्त की कीर्ति को बढाया | प्रेमपाश में बंधे भगवान की कृपा और दर्शन का परम सौभाग्य विरलों को ही मिलता है और रसखान भी उन्ही में से थे |